परिचय
लद्दाख की बर्फीली वादियों में एक ऐसी आवाज गूंज रही है ,जिसने दिल्ली की सत्ता की गलियारों में हलचल पैदा कर दी है । यह आवाज है प्रसिद्ध शिक्षा सुधारक , साइंटिस्ट और एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक जिन पर एक फेमस फिल्म 3 ईडियट्स बनाई गई थी जिन्हें हम ‘फुंसुक वांगड़ू’ के रूप में भी जानते हैं। लेकिन इस बार उनका अंदाज़ मजाकिया नहीं, बल्कि बेहद गंभीर और चेतावनी भरा है।
सोनम वांगचुक को NSA के तहत गिरफ्तार किया गया. (फोटो: आजतक)सोनम वांगचुक ने केंद्र सरकार पर ऐसा हमला बोला है की सरकार को अब डर महसूस होने लगा है ।उन्होंने कहा है कि देश की जनता को बेवकूफ समझने की गलती न की जाए। उनका यह बयान उस गहरी पीड़ा और गुस्से से निकला है, जो लद्दाख के अधिकारों की लड़ाई और सरकार के कथित उदासीन रवैये से उपजा है।
आवाज़ उठाने वालों को बदनाम करने का नया “डिजिटल” हथियार?
हथियार ? सोनम वांगचुम ने एक बेहद ही संगीत आरोप लगाया है उन्होंने कहा है कि जब भी कोई देश का नागरिक सरकार की नीतियों का विरोध करता है , तो उसे चुप करने के लिए सरकार सीधे जवाब देने के बजाय फेक सोशल अकाउंट्स फेक सोशल मीडिया आईटी सेल का सहारा लेकर उसे व्यक्ति को छवि कि खराब करने की कोशिश की जाती है ।
यह एक खतरनाक ट्रेंड है। क्या लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना गुनाह है? वांगचुक का आरोप है कि सरकार बातचीत और समाधान के बजाय, आलोचकों को “राष्ट्र-विरोधी,” “टुकड़े-टुकड़े गैंग” या “विदेशी एजेंट” बताकर बदनाम करने की कोशिश करती है, ताकि उनकी असली मांगों से जनता का ध्यान भटकाया जा सके।
क्यों नाराज़ हैं सोनम वांगचुक ।

सोनम वांगचुक पिछले काफी समय से लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और इसे संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग कर रहे हैं। उनकी मांगें लद्दाख की अनूठी संस्कृति, पर्यावरण और जनजातीय पहचान को बचाने के लिए हैं। जब उनकी बातों को दिल्ली की सत्ता में बैठे सरकार ने नहीं माना तो उन्होंने 21 दिनों तक केवल नमक और पानी पर अनशन किया था फिर भी बीजेपी और सरकार में बैठे लोगों के कानों में जू तक नहीं रेंगी ।
उनका कहना है कि चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपने घोषणापत्र में इन मांगों को पूरा करने का वादा किया था, लेकिन सत्ता में आने के बाद वे अपने वादे से मुकर गए। जब वांगचुक और लद्दाख के लोगों ने वादा याद दिलाया, तो उन्हें कथित तौर पर धमकियों और बदनाम करने वाले अभियानों का सामना करना पड़ा।
लोकतंत्र पर हमला?
यह घटना सिर्फ सोनम वांगचुक तक सीमित नहीं है, ऐसा देखा जाता है कि जब भी कोई सरकार के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश करती है तो उसे दबाया जाता है । किसान आंदोलन हो, छात्र प्रदर्शन हो या किसी भी सामाजिक कार्यकर्ता की आवाज़, अक्सर यह देखा गया है कि मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और सोशल मीडिया पर हजारों ट्रोल अकाउंट्स एक साथ उन पर हमलावर हो जाते हैं।
उनका मुद्दा देश के मुद्दे से हटकर एक ऐसे व्यक्ति या ऐसे समाज की छवि खराब करने में लग जाते हैं, जो सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं उनका काम सिर्फ यही होता है ,कि उसे व्यक्ति को इतना बदनाम कर देना कि लोग उसे एंटी नेशनल देखने लगे उनका बात सुना बंद कर दें ।
सोनम वांगचुक का यह कहना कि “देश की जनता बेवकूफ नहीं है,” असल में सरकार और इस इकोसिस्टम के लिए एक सीधी चेतावनी है। डिजिटल प्रोपेगेंडा के दौर में लोग अब सच और झूठ के बीच का फर्क समझने लगे हैं।
भारतीय सरकार को यह समझना चाहिए की आवाज दबाने से आवाज शांत नहीं होती एक विकराल रूप ले लेती है ऐसा आपको हालिया दिनों में नेपाल की सरकार के साथ देखने को मिल चुका है, जहां पर ज़ेन्जी प्रोटेस्टर्स ने नेपाल की सरकार को गिरा दिया और एक नई सरकार की सत्ता नेपाल का भविष्य डिसाइड करेंगे ।
एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान यही है कि वह अपने आलोचकों को सुनता है और बातचीत से समाधान निकालता है न कि उन्हें ट्रोल आर्मी से चुप कराता है। सोनम वांचू की आवाज सिर्फ आज उनकी आवाज नहीं है आज उन सब भारतीयों की आवाज है जो अपना सच सरकार के सामने बोलने से डरते हैं ।













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